श्री राधाकृष्ण के संयुक्त रूप को युगलकिशोर कहा जाता है। युगल का प्रयोग जोड़ा (couple ) के लिए किया जाता है। श्री राधाकृष्ण के संयुक्त स्वरुप का आराधना करने से बहुत पुण्य प्राप्त होता है। साक्षात् नारायण द्वापर युग में पृथ्वी पर अवतरित होकर अपने लीला के माध्यम से पृथ्वी के प्राणी को सच्चे प्रेम का अर्थ बताया था। राधाकृष्ण के इस स्वरुप का गुणगान है इस आरती युगलकिशोर की कीजै (Aarti Yugal Kishoreki Keejai) में।
आरती युगलकिशोर की कीजै (Aarti Yugal Kishoreki Keejai in Hindi)
आरती युगलकिशोर की कीजै। तन मन धन न्यौछावर कीजै॥
गौरश्याम मुख निरखन लीजै, हरि का स्वरूप नयन भरि पीजै।
रवि शशि कोटि बदन की शोभा, ताहि निरखि मेरो मन लोभा।
ओढ़े नील पीत पट सारी, कुन्जबिहारी गिरिवरधारी।
फूलन की सेज फूलन की माला, रत्न सिंहासन बैठे नन्दलाला।
कंचन थाल कपूर की बाती, हरि आये निर्मल भई छाती।
श्री पुरुषोत्तम गिरिवरधारी, आरती करें सकल ब्रजनारी।
नन्दनन्दन बृजभान किशोरी, परमानन्द स्वामी अविचल जोरी।
– : – इति श्री आरती युगलकिशोर की कीजै समाप्त – : –
Aarti Yugal Kishoreki Keejai (In English)
aarti yugalakishor ki kijai, tana man dhan nyauchhavar kijai |
Gaurshyam mukha nirakhan lijai, hari ka swarup nayan bhari pijai |
ravi shashi koti badana ki shobha, tahi nirakhi mero man lobhaa |
odhe nil pit pat sari, kunjabihari girivar dhari |
phulan ki sej phulan ki mala, ratn simhaasan baithe nandalala |
kanchan thaal kapur ki baati, hari aaye nirmala bhaii chaati |
shri purushottam girivaradhaari, aarati karen sakal brajanaari |
nand nandan brjabhaana kisori, paramaanand swaami avical jori |
श्री कृष्ण चालीसा (Shri Krishna Chalisa)
