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भगवान शिव ने पार्वती की परीक्षा लेने के लिए मगरमच्छ रूप धारण किया

Pt. Ram Chandra 7 वर्ष ago
Shiv Parvati Parkshan

भगवान शिव ने पार्वती की परीक्षा लेने के लिए बने  मगरमच्छ

यह कथा उस समय कि है जब भगवान शिव को वर के रूप में प्राप्ति के लिए देवी पार्वती जंगल में घोर तपस्या में लीन थी। उनकी ऐसी तपस्या देख कर समस्त देवगण शिव जी से प्रार्थना कर रहे थे कि हे देवाधिदेव पार्वती की मनोकामना पूरा करें।

भगवन शिव ने सप्तर्षियों को देवी पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भेजा। सप्तर्षियों ने शिव जी की अनेकों अवगुण का जिक्र किया फिर भी पार्वती को शिव के अलावा किसी और से विवाह मंजूर नही था।

विवाह से पहले जगत पिता शिव अपनी होने वाले पत्नी पार्वती में इस जगत के सभी प्राणियों के प्रति उनकी दया भाव को लेकर आश्वस्त होना चाहते थे। इसलिए शिव जी ने स्वयं भी पार्वती की परीक्षा ली।

भगवान भोले नाथ पार्वती के तपस्या से खुश होकर एक दिन प्रकट हुए और वरदान देकर पुनः अंतर्ध्यान हो गए। उसके कुछ ही देर बाद वही पास के एक तलाव में विशाल मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ लिया।

बालक अपनी प्राण रक्षा के लिए चिल्लाने लगा। पार्वती से उस बालक की चीख सुनी नही गई। द्रवित हृदय से करुणामयी माता पार्वती उस तालाब की ओर भागी। वहां पहुंचकर देखती हैं कि एक विशाल मगरमच्छ एक नन्हे बालक को तालाब के अंदर खींचकर ले जाने की चेष्टा कर रहा है।

बालक देवी पार्वती को देख कऱ रोने लगा और बोला हे माता मुझे इस दुष्ट मगरमच्छ से बचा लो। इस संसार में मेरा न पिता है, न माता है और न ही कोई मित्र। आप ही मेरे प्राण की रक्षा कर सकते हो।

ये सुनकर माता पार्वती की ह्रदय और भी द्रवित हो गयी और वो बोली – “हे ग्राह ! तुम इस नन्हे बालक को छोड़ दो। ”

मगरमच्छ बोला- “मैं भला क्यों छोडूं। इस समय पर जो मुझे मिलता है, उसे अपना आहार समझ कर ग्रहन कर लेता हूँ ,यही मेरा नियम है। मैं इस बालक को नहीं छोडूंगा। ”

देवी पार्वती ने पुनः विनती की – “हे ग्राह ! तुम इसको छोड़ दो। बदले में तुम्हें जो भी चाहिए वह बोलो ।

मगरमच्छ बोला – “मैं एक ही शर्त पर इस बालक को छोड़ सकता हूं। वह ये है कि आपने महादेव का जो तपस्या किया है उस तप का फल मुझे दे दीजिये । ”

माता पार्वती तुरंत तैयार हो गईं।

वो बोलीं – ” मैं अपने तप का फल तुम्हें दे दूंगी लेकिन तुम इस बालक को मुक्त करो। ”

मगरमच्छ फिर बोला – “हे देवी आप ठंडे दिमाग से सोचकर फैसला लो। आवेश में आकर संकल्प मत लो। आप ने जो हजारों वर्षो से तप किया है वो देवता से भी संभव नहीं है। और उस तप का फल इस तुच्छ बालक के जान के बदले चला जायेगा। ”

माता पार्वती बोली – “हे ग्राह ! मेरा निश्चय अटल है। मैं अपने हजारों वर्षों के तप का फल तुम्हे देती हूं। तुम इसका जीवन बक्श दो ।”

फिर माता पार्वती से तपस्या दान का संकल्प करबाया। तप का दान होते ही मगरमच्छ का शरीर एक तेज प्रकाश सा चमक उठा ।
मगरमच्छ बोला- हे देवी , देखो आपके तप के प्रभाव से मैं प्रकाशमय हो गया हूं। आपने सालों की तपस्या एक बच्चे के लिए गमा दी। चाहो तो मैं तुम्हे अपनी गलती सुधारने का एक अवसर और दे सकता हूं।

पार्वती जी ने कहा- “तप तो मैं पुन: कर सकती हूं, किंतु यदि तुम इस बालक को निगल जाते तो क्या इसका जीवन पुनः वापस मिल पाता ?”

देखते ही देखते बालक और मगरमच्छ दोनों ही अदृश्य हो गये ।

पार्वती जी ने सोचा – मैंने तप दान कर दिया। अब पुन: तपस्या प्रारंभ करती हूं। और फिर से तपस्या करने का संकल्प लिया।

संकल्प लेते ही फिर से भगवान शिव प्रकट हुए और बोले- हे पार्वती, भला अब क्यों तपस्या करने जा रही हो?

पार्वती जी ने कहा-” प्रभु ! मैंने अपनी सारी तपस्या दान कर दिया है। आपको पति के रूप में पाने के लिए मैं फिर से वैसा ही कठीन तपस्या कर आपको प्रसन्न करुंगी।”
शिव जी ने कहा – “हे पार्वती मगरमच्छ और लड़के दोनों ही रूपों में मैं ही था। तुम्हारा चित्त संसार के सुख-दुख का अनुभव करता है या नहीं, इसकी परीक्षा लेने के लिए मैंने ही यह सब किया था। सभी रूपों में दिखने वाला मैं ही हूं। तुमने अपना तपस्या मुझे ही दिया है। ”

इस तरह पार्वती जी ने अपनी परीक्षा में सफल हुईं।

Tags: parvati Shiv पार्वती भगवान शिव

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