भगवान महादेव पर शनिदेव के कुदृष्टि
हिन्दू धर्म शास्त्र के अनुसार शनि ग्रह के पिता सूर्य देव और माता छाया देवी हैं। शनि देव बहुत ही उग्र स्वाभाव के मने जाते है। बचपन से ही शनि देव बड़े ही उदण्ड स्वाभाव के थे। उनकी इस स्वाभाव से पिता सूर्य देव बहुत ही कुपित थे। एक दिन परेशान होकर सूर्य देव भगवन शिव के पास पहुंचे। अपने पुत्र के उदंडता का सारा गाथा शिव जी को सुनाया। शिव जी शनि देव को बहुत समझाये। फिर भी शनि देव में कोई परिवर्तन नहीं हुआ वो पहले की तरह ही उदंडता करते रहे।
इससे भगवान शिव बहुत ही क्रोधित हो गए और शनि देव पर प्रहार कर दिए। शनि देव इस प्रहार से मूर्छित हो कर गिर गए।
पिता सूर्य देव ने भगवान शिव की बहुत प्रार्थना की तब जाकर भगवन शिव ने मर्च्छित शनि देव को होश में लाए और उन्हें अपना शिष्य बना लिए। अब भगवान शिव , शनिदेव से अपने न्याय कार्य में सहयोग लेने लगे।
एक दिन शनि देव कैलाश पर आए और महादेव से कहा हे गुरु देव कल मैं आपकी राशि में प्रवेश कर रहा हूँ। अतएव मेरी कुदृष्टि आप पर पड़ने वाली है। भगवान शिव यह सुनकर परेशान गए और पूछे आप की ये वक्र दृष्टि कब तक मेरे उपर रहेगी।
शनि देव ने उत्तर दिया आप की राशि पर शनि का प्रभाव कल सवा पहर तक रहेगा। अतः कल सवा पहर तक मेरी वक्र दृष्टि आप पर रहेगी।
अगले सुबह भगवान शिव शनि के कुदृष्टि से बचने के उपाय सोचने लगे। फिर फैसला किया कि आज मुझे शनि की दृष्टि से छुप के रहना चाहिए। अतः भगवन शिव हाथी का भेष धारण कर मृत्यु लोक यानि पृथ्वी पर आगये। पुरे दिन पृथ्वी पर इधर उधर विचरण करते रहे।
सायं काल भगवान सोचे अब शनि मेरे राशि से चला गया है अब मुझे कैलाश लौटना चाहिए। और फिर कैलाश लौट आए। कैलाश लौटते ही भगवान देखा कि शनि देव पहले से ही वहां मौजूद हैं। शनि देव को देखते ही भगवन महादेव खुश हो कर बोले हे शनि देव आप के दृष्टि का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। मैं आज अपने आपको आपके वक्र दृष्टि से सुरक्षित रख लिया।
भगवान महादेव की ऐसी बातें सुनकर शनि देव हंसने लगे और कहने लगे हे चराचर के स्वामी शनि के दृष्टि से मनुष्य ,देवता या दानव कोई भी नहीं बच सकता है। यहाँ तक कि इस चराचर के स्वामी आप भी नहीं बंचित रह पाए मेरे प्रभाव से। भगवन महादेव अचम्भित हुए पूछे यह कैसे ?
शनि देव बड़ी शालीनता से मुस्कुराते हुए बोले कि मेरे ही दृष्टि के कारण आप कैलाश छोड़कर पुरे दिन पृथ्वी पर पशु योनि में इधर उधर भटकते रहे। यह सुनकर भगवान महादेव हंसने लगे और शनि देव को गले लगाया। पुरे कैलाश वासी शनि देव की जयजयकार करने लगे।
