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जब प्रभु राम और भगवन महादेव में हुई थी भीषण युद्ध – जानें किसकी हुई थी जीत?

Pt. Ram Chandra 7 वर्ष ago
Ram Mahadev Yuddh

प्रभु राम और भगवन महादेव में भीषण युद्ध (Fight between Ram and Mahadev Shiv)

बात त्रेता युग की है जब भगवान विष्णु अपने सातवें अवतार में श्री राम (Sri Ram) के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए थे। भगवान राम ने रावण का वद्ध कर अयोध्या लौटने के बाद एक अश्वमेघ यज्ञ किया था। उन दिनों वही सम्राट अश्वमेघ यज्ञ किया करता था जिसकी अधीनता अन्य सभी राजा स्वीकार करते थे।

अश्वमेघ यज्ञ में एक अश्व (घोड़ा) के सिर पर एक विजय पत्र लिखकर सभी राज्य में भेजा जाता था। उसके पीछे राजकुमारों और वीरों के नेतृत्व में हजारों सैन्य जाते थे । जो भी नरेशा अश्व (घोड़ा) को रोककर अधीनता मानाने से इंकार करता उससे लड़ाई होती थी और उसको जीत कर आगे बढ़ते जाते थे ।

अयोध्या के सेना का नेतृत्व राम के अनुज शत्रुघ्न, हनुमान और भरत पुत्र पुष्कल सहित अन्य योद्धा कर रहे थे।

इस अश्व भ्रमण के क्रम में प्रभु श्री राम का घोड़ा राजा वीरमणि के राज्य देवपुर में पंहुचा। वीरमणि बहुत ही न्यायप्रिय धर्मज्ञ राजा थे तथा प्रभु श्री राम और शिव के अनन्य भक्त थे। इनके दो पुत्र रुक्मांगद और शुभागंद श्रेष्ठ वीर थे। साथ ही वीरमणि के अनुज वीरसिंह एक महान पराक्रमी थे।

देवपुर घोड़ा के पहुँचने पर रुक्मांगद ने उसे बन्दी बना लिया और अयोध्या के सेना से कहा कि शत्रुघ्न से बोलो हमसे युद्ध कर अपना अश्व छुड़ा सकता है छुड़ाले। ये बात जब वीरमणि तक पहुंचा तो उन्हें बहुत दुख हुई । अपने पुत्रों से बोला ये श्री राम के यज्ञ का अश्व है तुम्हे इसको छोड़ देना चाहिए। रुक्मांगद बोला पिता जी हमने उनको युद्ध के लिए चुनौती दे दी है अतः अब युद्ध ही एक रास्ता है। अन्यथा देवपुर और अयोध्या दोनों का ही अपमान होगा। यह सुन वीरमणि ने युद्ध की आज्ञा दे दी। और वीरमणि, रुक्मांगद, शुभागंद, वीरसिंह अपने सेना के साथ युद्ध भूमि पहुंच गए।

इधर जब शत्रुघ्न को पता चला तो वो बहुत क्रोधित हुए और अपनी सेना लेकर युद्ध भूमि पहुँच गए। ये बात जब महाबली हनुमान को पता चला तो उन्होंने कहा देवपुर से युद्ध करना बहुत कठिन है यह तो परम पिता ब्रह्मा के लिए भी मुश्किल है क्योंकि यह राज्य महाकाल द्वारा रक्षित है। हमें बातचीत से इस को सुलझाना चाहिए। अगर फिर भी नहीं सुलझता है तो प्रभु श्री राम को सूचित कर देना चाहिए। राजा वीरमणि प्रभु राम का बात अबश्य मानेंगे।
शत्रुध्न बोले इस के लिए भ्राता श्री राम को युद्ध भूमि में बुलाना उचित नहीं हैं। हम युद्ध भूमि में आगए हैं अब युद्ध ही एक अंतिम विकल्प है।

दोनों तरफ की सेनाएं भीषण युद्ध प्रारम्भ कर दिया। भारत पुत्र पुष्कल से वीरमणि की लड़ाई चल रही थी। हनुमान और वीरसिंह एक दूसरे पर प्रहार कर रहे थे। शत्रुघ्न के साथ रुक्मांगद शुभांगद लड़ने लगे। सभी बहुत वीर योद्धा थे। इधर वीरमणि को पुष्कल ने अपने दिव्य वाणों प्रहार से मूर्छित कर दिया। इधर हनुमान ने वीर सिंह को अपने भयानक प्रहार से मूर्छित कर दिए। शत्रुघ्न दोनों भाइयों को नागफांस से बांध दिए। अपनी विजय देख अयोध्या की सेना जयजयकार करने लगी ।

कुछ देर में जब वीरमणि को होश आया तो अपनी हार करीब देख, भगवान महदेव को स्मरण करना प्रारम्भ किया। महादेव अपने अनन्य भक्त वीरमणि की पुकार सुन कर अपने सेना को वीरभद्र , नन्दी और भृंग के साथ उसकी सहायता के लिए भेज दिए।
शंकर के सारे अनुचर युद्ध भूमि में प्रलय मचाने लगे। अयोध्या के सेना में हाहाकार मच गया। रुद्रावतार वीरभद्र को महाकाल के रूप में देख कर शत्रुघ्न भयभीत हो गए। फिर भारत पुत्र पुष्कल ने कहा कि अब तो हमारे पास कोई विकल्प नहीं है अतः युद्ध करना ही होगा। और इस प्रकार पुष्कल वीरभद्र से, हनुमान नन्दी से और शत्रुघ्न भृंग से युद्ध करने लगे। पुष्कल ने सारे दिव्यास्त्र का प्रहार वीरभद्र पर कर लिए परन्तु वीरभद्र का कुछ नहीं हुआ।

तब वीरभद्र पर शक्ति का प्रहार करदिया। उसके बाद वीरभद्र ने क्रोधित होकर पुष्कल का मष्तक अपने त्रिशूल से काट दिया । भृंगी ने शत्रुघ्न को बन्दी बना लिया।

इधर हनुमान और नंदी में घमासान मची हुई थी। दोनों की उत्पति महादेव के प्रखर तेज से हुई थी अतः ये लड़ाई बहुत ही भीषण था। अंत में नंदी को शिवास्त्र का प्रयोग कर, हनुमन को पराभूत किया । अब ये सब देख अयोध्या के सेना के ऊपर देख वीरमणि का सेना टूट परा। फिर हनुमान ने शत्रुघ्न से कहा मैं ने पहले बताया था। ये युद्ध नहीं करना चाहिए। अब एक ही उपाय है श्री राम का स्मरण करें। वही कुछ कर सकते है। ऐसा सुनते ही सब प्रभु श्री राम का स्मरण करने लगे।

श्री राम ने अपने अनुचरों का पुकार सुनकर शीघ्र अपने अनुज लक्षमण और भारत के साथ युद्ध भूमि आये। प्रभु के आते ही अयोध्या के सेना मैं मानो जान आ गई। प्रभु स्वयं अनुज शत्रुघ्न को मुक्त कराया। लक्ष्मण जी ने हनुमान जी को मुक्त कराया। उसके बाद पुष्कल की स्थिति देख भारत मानो मूर्छित हो गया। भगवान् श्री राम बहुत क्रोधित हो गए। वीरभद्र से बोले अब तुम भी अपने जीवन का अंत समझ ले। और उन्होंने शिव के अनुचरों पर प्रहार करना शुरू कर दिया।

शिव गण भी कोई साधारण नहीं थे अपने प्रहारों का शिव गण पर कोई असर न होते देख भगवान राम विश्वामित्र द्वारा दिया हुआ दिव्यास्त्र का प्रयोग कर वीरभद्र, नन्दी और भृंग सहित समस्त शिव गण को परास्त कर दिया। अपनी हार सुनिश्चित देख शिव गण ने महादेव को आह्वान किया।

अपने अनुचर को इस परिस्थिति में देख स्वयं महादेव युद्ध भूमि में प्रकट हुए। ये एक अद्वितीय दृश्य था इसको देखने के लिए समस्त देवगन आकाश लोक में एकत्रित हो गए। शिव के आते ही उनके प्रखर कांति से अयोध्या की सेना मूर्छित होने लगे । भगवान राम, महादेव को देख कर शस्त्र त्याग दिए और शिव की स्तुति करने लगे। स्तुति करते हुए बोले हे तीनो लोकों के स्वामी आप ही के आशीर्वाद के फलस्वरूप मैं उस महान योद्धा रावण का वद्ध कर पाया। आप स्वयं ज्योतिर्लिंग रामेश्वर में आकर मुझे आशीर्वाद दिए थे। यह अश्वमेघ यज्ञ भी आप के ही कृपा से ही हो रही है। मुझे पर एक और कृपा कर इस युद्ध का अंत कर दीजिये ।

महदेव (Mahadev) बोले हे राम आप तो स्वयं जगत के पालन करता भगवान श्री विष्णु के अवतार हैं। आप से युद्ध मैं भी भला कैसे करना चाहूँगा। परन्तु में वीरमणि को दिए वरदान के आगे विवश हूँ। हे जगत के स्वामी आप को मुझ से युद्ध करना ही होगा। प्रभु श्री राम महादेव का आज्ञा समझ युद्ध प्रारम्भ किया। यह युद्ध देवताओं के लिए भी अद्भुत था जहाँ एक तरफ इस सृष्टि के पालन करता विष्णु रूप राम थे और दूसरे तरफ देवाधि देव महादेव थे । दोनों में भीषण संग्राम हुआ। श्री राम अपने सारे दिव्यास्त्र का प्रयोग कर लिए परन्तु महाकाल के समक्ष एक भी नहीं टिक पायी। अन्ततः उन्होंने शिव से ही प्राप्त पशुपतास्त्र का प्रयोग कर बोले हे शिव ये तो आप के ही आशीर्वाद से प्राप्त है। मैं आप पर ही इसका प्रयोग करता हूँ। और यह पाशुपतास्त्र शिव के ह्रदय स्थल में समाहित हो गया। शिव जी श्री राम के युद्ध कौशल से प्रसन्न हुए। बोले हे राम हम आप के युद्ध कौशल से संतुष्ट हुए आप वरदान मांगिये। प्रभु राम बोले युद्ध में आहात पुष्कल सहित सभी गण को प्राण दान दीजिए। शिव तथास्तु कह मुस्कुराने लगे। पुष्कल सहित दोनों तरफ के सभी योद्धा जीवित हो गया। वीरमणि ने अश्वमेघ अश्व भी वापस कर दिया। इस तरह इस दिव्य युद्ध का हुआ।

Tags: Ram Shiv महादेव राम शिव

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