सबसे बड़े आध्यात्मिक गुरु : मिथिला के राजा जनक (King Janak of Mithila : A Great Spiritual Teacher)
एक बार एक साधु मिथिला (Mithila) नगरी के भ्रमण के लिए आया। उन दिनों मिथिला नगरी के राजा जनक (King Janak) थे जो अत्यंत ही न्यायप्रिय थे। वो संसार में एक मात्र व्यक्ति थे जो गृहस्ताश्रम में रहते हुए भी ऋषि का जीवन जीते थे। वो बड़े ही आध्यात्मिक थे और विदेह के नाम से जाने जाते थे ।
साधु ने नगर में भ्रमण कर लोगों से जानना चाहा – “यहाँ सबसे अच्छा आधात्मिक गुरु कौन है ?”
सभी ने एक ही उत्तर दिया – राजा जनक।
साधु पहले तो हैरान हुआ कि भला कैसे एक राजा जो गृहस्ताश्रम में सांसारिक सुख के साथ जिंदगी जीता है आध्यात्मिक रूप से इतना ऊँचा हो सकता है। फिर अकस्मात यह सोचकर अति क्रोधित हो गया कि यहां के लोग नहीं जानते हैं कि सच्ची आध्यात्मिकता क्या है।
फिर उसने राजा जनक से खुद मिलने का मन बनाया।
वह राजा के पास गया और बोला – हे राजन आप अपने लोगों को बताएं कि आध्यात्म क्या होता है सभी अशिक्षित हैं उन्हें शिक्षा दें। मैंने पूछा कि नगर का सबसे बड़ा आधात्मिक व्यक्ति कौन है तो सभी ने आपका नाम लिया। भला कैसे संभव है की एक सांसारिक सुख में जीने वाला व्यक्ति उनसे बड़ा आध्यात्मिक हो सकता है जिन्होंने ने सत्य और आध्यात्म के लिए अपनी संपूर्ण जीवन समर्पित कर दी है।
राजा जनक बोले – हे ऋषिवर आप बहुत दूर से आकर पूरा नगर भ्रमण किये हैं । अतः आप बहुत थक गए होंगे। आप भोजन करें और फिर आज आराम करें । ये सब बातें हम कल सुबह कर सकते हैं ।
साधु को शाही अंदाज में भोजन कराया गया। नाना प्रकार की स्वादिष्ट व्यंजन पड़ोसे गए। साधु को पूरी तरह से आत्मतृप्त किया गया। फिर उन्हें एक शानदार कमरे में सोने के लिए ले जाया गया। यहाँ एक बहुत ही आरामदेह बिस्तर था साधु के सोने के लिए । साधु आराम करने गए तो देखा की बिस्तर के ठीक सामने गर्दन के ऊपर छत से एक तलवार लटक रहा है वो कभी भी गिर सकता है ।
साधु ने सेवक से पूछा – यह क्या है ?
सेवक ने कहा – यह हमारे यहाँ की एक पुराणी प्रथा है। आप चिंता न करें, निश्चिंत होकर आराम करें। यह कह सेवक चला गया।
साधु तलवार के गिरने के डर से पुरी रात जगता रहा। वह कोशिश करने के बाद भी आँख नहीं बंद कर सका। उन्हें चिंता थी की कहीं तलवार गिरने से उनकी जान न चला जाय।
राजा जनक अगले सुबह साधु से मिले और पूछे – हे ऋषिवर आप की रात कैसे कटी। आशा है की आप अच्छी तरह से सोये होंगे।
साधु ने जबाब दिया – मैं कैसे सो सकता था मेरी गर्दन के ऊपर एक तलवार लटक रही थी।
राजा जनक ने कहा – हे ऋषिवर माफ़ी चाहता हूँ इसके लिए। परन्तु मैं यही समझाना चाहता था कि मृत्यु रूपी तलवार यदि मनुष्य के ऊपर लटक रहा है तो वह कैसे सांसारिक सुख के चलते अपने कर्तव्यों से, आध्यात्म से विमुख हो सकता है।
